Wednesday, 4 June 2014

छोटे गीत



                                                     छोटे गीत 

गीत  कम , हृदय के  कुछ पहलु हैं।  ख़ुद  भी  न समझ पाया , ये दर्द है , दवा  हैं  , बकवास हैं या कुछ और। आपकी कुशाग्र  बुद्धि में कुछ पकड़ आए तो कम -अक्ल खाकसार को भी बताइयेगा। पहले वाले का शिर्षक भी  सुझाइए 

सियासत तेरी नज़म का क्या ऐतबार,
आवाम  की  सुबा की वो दरकिनार।
बद  इख़्लाक़ के अब  उतरे हैं  सवार,
डर  की ना हो बद -ज़बानी की ब्यार।
नई जमात ने किया खुद को दरकिनार ,
 कुनबे में उनके छुपते रहें कुछ दागदार।
इल्तज़ा बस रखना इन्सानियत बरक़रार,
अच्छा लगता क्या माँ के आँसू  दो-चार।
मेरे मुल्क में खिले फिर से  गुल हज़ार ,
हमारा क्या , दरबदर रहे हम ख़ाकसार।



रंगीन सियासत 

सियासत की पिचकारी से पंक
जारी हैं कुछ दिनों से एक ही  रंग
लाख दर्ज़े भले हम जैसे  मलंग
होरी  इनके भक्त न कर दे भंग


मीडिया स्पेशल 

 1   विकल्प  अब न्यूज़ -रूम्स  मे बनाइए
     लोकतंत्र  को  बस ना इतना भर्माइए
     कभी खकसारो को सच तो दिखाइए
     न समझे तो सिर्फ आईना छोड़ जाइए



 
व्यंग ना छोड़ जो तेरा आभूषण
झकझोर, चेतना दे अधमरो में।
जानता मुझसे अधिक निस्पक्ष तु
थोड़ा तो सींच खुद अपने जड़ो में।