लौट जा तू अब हे ,पुण्य वाचिनी ।
अविरल कैसे बनेगी धारा
मद्धिम बनी अब शीघ्रगामिनी
रेत टीलों से भरा तट सारा
कैसे तड़पती जीवनदायिनी।
असि ,वारुणी का बंद सहारा
मलित त्रिलोचन जटा वासिनी
कहीं मल, कहीं गिरता पारा
जल था जिसका जैसे दामिनी।
शहरोँ ने जैसे किया संहारा
शांत है क्रीड़ा -कलोल कामिनी
लूट की फिर चलेगी ब्यारा
तु कैसे बचेगी पतित -पविनी।
योजना भी अब लगे नकारा ,
क्या तु भी अब पाताल-वहिनी
मुक -बघिर जब तेरा दुलारा
लौट जा तू अब हे ,पुण्य वाचिनी ।