गण का क्या , उसके लिए तो ये योजना जैसे टाट पे पैबन्द
हम हाकिमो को क्रियावन्नन से हमें मिलेगा सिर्फ धूल औ कंद।
बगल खड़ा खाकसार चौकीदार मुस्कुराया मन ही मंद -मंद ,
हुक्मरान नए हुए तो क्या हुआ ,तेवर रहे पुरानी वाली बुलन्द।
सरकारी अलमारी से अब भी आती हैं सड़े फाईलो का सुगंध ,
दल्ले , टाऊट ने कोसो दूर से भाँप लिया हैं नया कुछ प्रबन्ध।
बदला क्या व्यवस्था में : निकल के सोच रहा योजना का छंद ,
मन को कैसे राजी कर लूँ विकास और नीति का हुआ लामबन्द।
भ्रष्टचार पे कम ,अकर्मठता पे ज्यादा चलता हैं जन-दण्ड ,
पुराने राजनीतिज्ञ हो सोचकर हम भी करते हैं तुमपे घमण्ड।
छवि तुम्हारी अब भी बेदाग प्रहरी , नहीं हैं अब भी उसपे दंश ,
बिन परिवार ख्यात के तुम लगते हो मेरे भ्राता ,पिता का अंश।
अधेड़ हो चला मैं भी देख व्यवस्था के चिर -पुराने रंग -तरंग ,
दोष तो मेरा भी बनता हैं की अब का युवा न हमारे सा मलंग।
छोड़ो ढिंढोरा ,चाबुक थामो नहीं तो मन में रहेगा हमेशा द्वंद ,
मेरी पीठ भी न बख्शना ,गर वाजिब लगे देना मुझे भी दण्ड।