इल्ज़ामों में भी ,
संसद में भी ,
फैल रहा इसका प्रकोप।
निठ्ठलो को और ,
कुछ इलमदा को ,
डरा रहा इसका स्कोप।
मैं चंगा तु नंगा ,
हर काम में अड़ंगा ,
यही तो है आरोप।
तमाशा का ढेर ,
अंधे के हाथ बटेर ,
करें अविश्वास का रोप।
विजय की परिभाषा ,
तु तोला मैं माशा ,
आरोप बदले प्रत्यारोप।
धाक के वही पात तीन
बजता पालिसी का बीन
मनवा से हुआ चैन लोप।
हक्का-बक्का है गण ,
डूब रहा रे मेरा मन ,
क्या आपको भी आती झेप ?
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