Sunday, 4 May 2014

गाँधी की आँखें



               गाँधी  की आँखें 

मेरे  स्वपन मे' आना कभी  महात्मा
दिव्य-स्वपन न देखा कभी बंद आँखों से ;
अधिकार है तुमपर , सुन ऐ अमर आत्मा
तेरे देश वंसज देखते सपने खुलीं ऑंखों में। 


 मानस पटल से धूमिल होती माँ कि छविं
अनजान  सा  हुँ सजीव  निस्छल आँखों से :
व्यस्त हो तो पुज्य प्रार्थना करता तुच्छ कवि
दुविधा तो सँवाद भेजना नेताजी की आँखो में।



तुम्हारे उपदेश'का चाह नहीं रखता है अब मुल्क
स्वपन मे आना अन्यथा मेरि तरह सिसकियाँ भरोगे ;
बचकर आना नहीं तो हवा पर भी लगता शुल्क
निशा ओढ़ना नहीं तो अपनी भक्तोँ की अलग सुनोगे। 


सुना वाणी  से सम्मोहित होती थी जन मानस
रक्त कतरा-कतरा अनुरोध पर मिलता था तुम्हे ;
खुन गैर का आज भी आह्वाहन पर आनन फ़ानन
छद्म मंज़िल हासिल तो रास्ते से क्या मतलब हमेँ।



तेरी आँखों में जो था सच्चाई, कशिश का अफ़साना
पुस्तकों,मुर्तियों और  चित्रों  तक ही सिमट  गयीं है
मक्कारी, घृष्टता, प्रतिशोध ,अवमानना ,कायराना
आँखों पढ़ने की ईच्छा शक्ति भी हमसे निपट गयी हैं।  


हम और  हमारे सियासतदां एक दूजे से कतराते हैं

धर्म उन्मादि , भ्रष्ट ,विकास कि कंटस्थ हैं परीभाषा  

शिक्षा और श्रवण  से हम भारत -संतान घबराते हैं

वात्सल्य भरी मुस्कुराती आँखों में कितनी बची आशा ?

Twitter पर एक युवा को समर्पित ; काश की उसे समझा पाता कि 

हालात -ए- मुल्क तब  बदलते है सियासतदां 
अवाम जब तलक पूछती औ पकडती गिरेबान 




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