Tuesday, 22 April 2014

अवाम के बगैर सियासत माफ़िक शेर






                             अवाम  के बगैर  सियासत माफ़िक  शेर


 बदज़बानी  सियासत में पैंठ  कर रहा हैं  या  यूँ  कहिए की पैर  फैला रहा हैं आवाम  हासिए पर घिसकते जा रहे हैं।  कुछ  अपने  से  और  कुछ  भक्त -गणो  की  दरिया -दिली  से।  कोई आसान  रास्ता दिखे तो पकड़  मत लीजिएगा , बने  रहिए  sanity  के  कारवाँ में।  कष्ट  हैं  पर कोई दूसरा चारा हैँ  क्या ?
आपकी सोच  या उस नामचीन शायर को समर्पित ,"सूरज  को  दीप  दिखाने  सा"  सरीख  हैं  ये शेर।  गुस्ताख़ी इस खाकसार की मुआफ़ी के क़ाबिल हैं या नहीं  इसका  निर्णय  मुन्नवर राणा  या  आप ही कर सकेंगे। उन सियासतदान  से  गुज़ारिश  नहीं कर सकता मैं।  शायद  दिल  उन्हें  अपना मानता हीं नहीं। 
आपकी  सोहबत  से  मैंने  भी कुछ अच्छाई  सीखी । मुआफ़ी तो देगा खाकसार   लेकिन शर्त ये  की इन्तेखाब के बाद   मुल्क़  का  भला  करे  हमारे  तथा  कथित  हुक्मरान। 




1. 

(in poor taste an addition to original by Munnawar Rana ), बड़ी गलती हैं , उम्मीदन मुश्किल से क्षमा मिल ही जाएगी।
  बिगड़  गयी  तक़दीर  पर  खाकसार मुस्कुराते रहते  हैं , उधड़ रही तहज़ीब औ वो  बेदर्द मुकरर चिलाते रहते हैं। 


बिछड़ कर भी मोहब्बत के ज़माने याद रहते हैं,उजड़ जाती है महफ़िल और चेहरे याद रहते हैं. ----- by Munnawar Saheb


2.

खामोश नज़रों का बनता हैं अलग ही फसाना , दिल में दर्द और लब पर अंदाज़ ए शायराना।


3.

मोहब्बत ए खाकसार का बनता एक ही फ़साना ,जोखिम फक्त एक बार और ताउम्र हरजाना।


4 .

मोहब्बत ना होती तो क्या करता इज़हार , कसीदे क्यूँ बांधता तेरे लिए बस यूँ बेगार।



5 .

बेबस खूं भरी हमारी आँखें नाक़ाबिले हिमाक़त ,कसर बाकी जो बची तो सहाफी तेरी तिज़ारत।


6.

सवाल खाकसार की चाहत का कब था वादा ए अवाम तो आपकी वफ़ा का था।


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हम ख़ाक़सारों को कब थी इल्म-ए - ज़बां
कुछ तो समझ ही लेंगे गर तेरी शायरी मेहरबां।




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