Friday, 11 April 2014

शेर बगैर रदीफ़ औ काफ़िया


 इन्हें क्या कहुँ , मालूम नहीं शेर तो नहीं कह सकता। ना रदीफ़  , न काफ़िया की पकड़  हैं। शेर, कलाम , ग़ज़ल जानने वाले नाक भौं तो सिकोड़ेंगे।  बस इतना मालूम हैं की ये बदबख़्ती न है और ना आप इसे होने देंगे। 

जज्बात देखिए। 

गर थोड़ा भी सोचने पर मजबूर करता हैं या आपके चेहरे पर  मुस्कान लाता हैं तो लिखिएगा ज़रूर , शुकून मिलेगा ख़ाक़सारो को। 

1. 

 तिजारत ही क़ाबिल - -ेअते माद की तरक़ीब , हैं  उनका फ़साना :
 इल्म -उल -अदद  कब बनी इंसान की तसदीक़ , खाकसार भी जाना।


तिजारत - व्यापार ,ेअते  माद - विस्वास ,इल्म-उल-अदद -- गणन की कला ;तसदीक़ --इमान)

2. 

अवाम को हैं समझ की  तहज़ीब हैं दरकिनार, 

यकीनन इतनी बदज़बानी न करते हम ख़ाकसार। 

3. 

न शर्माइए देख उस सहाफी की तिजारत ,

रंगो-रोशन जब किया एक टूटती ईमारत।  

4. 


मुद्दत से मिली थी इस ख़ाक़सार को ये शुकून औ  फुर्सत जी ले ज़रा अपने लिए , ये नायाब वक़्त भी होगा रुखसत। 


5. 

इल्म कब   बख्श देता   इनायतें तहजीब 

 तालीम से जदोजहद  से हासिल हैं तरक़ीब 




ज़फ़ा ए  हुकमरान औ कहकहाँ  ए ख़ाकसार,

मसला ए  मज़हब  औ बाकी मुद्दे दरकिनार। 


7.  

मोहब्बत  ना  होती तो क्या करता इज़हार ,

कसीदे  क्यूँ  बांधता तेरे लिए बस यूँ बेगार। 



हरकतें  इंसान  देख बेबस  बेज़ुबान भी शरमाते हैं 

हालात ए माली छोड़िये , हम खूं देने से घबराते हैं 





No comments: