इन्हें क्या कहुँ , मालूम नहीं शेर तो नहीं कह सकता। ना रदीफ़ , न काफ़िया की पकड़ हैं। शेर, कलाम , ग़ज़ल जानने वाले नाक भौं तो सिकोड़ेंगे। बस इतना मालूम हैं की ये बदबख़्ती न है और ना आप इसे होने देंगे।
जज्बात देखिए।
गर थोड़ा भी सोचने पर मजबूर करता हैं या आपके चेहरे पर मुस्कान लाता हैं तो लिखिएगा ज़रूर , शुकून मिलेगा ख़ाक़सारो को।
1.
तिजारत ही क़ाबिल -ए -ेअते माद की तरक़ीब , हैं उनका फ़साना :
इल्म -उल -अदद कब बनी इंसान की तसदीक़ , खाकसार भी जाना।( तिजारत - व्यापार ,ेअते माद - विस्वास ,इल्म-उल-अदद -- गणन की कला ;तसदीक़ --इमान)
2.
अवाम को हैं समझ की तहज़ीब हैं दरकिनार,
यकीनन इतनी बदज़बानी न करते हम ख़ाकसार।
3.
न शर्माइए देख उस सहाफी की तिजारत ,
रंगो-रोशन जब किया एक टूटती ईमारत।
4.
मुद्दत से मिली थी इस ख़ाक़सार को ये शुकून औ फुर्सत जी ले ज़रा अपने लिए , ये नायाब वक़्त भी होगा रुखसत।
5.
इल्म कब बख्श देता इनायतें तहजीब
6
ज़फ़ा ए हुकमरान औ कहकहाँ ए ख़ाकसार,
मसला ए मज़हब औ बाकी मुद्दे दरकिनार।
7.
मोहब्बत ना होती तो क्या करता इज़हार ,
कसीदे क्यूँ बांधता तेरे लिए बस यूँ बेगार।
8
हरकतें इंसान देख बेबस बेज़ुबान भी शरमाते हैं
हालात ए माली छोड़िये , हम खूं देने से घबराते हैं
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