छूटता बंधन -3
पिछले कुछेक वर्षो में राजनीति में प्रशनो के उत्तर में प्रशन या दुसरे का दोष उजागरण प्रचलित हो गया है।
ये टीवी के विश्लेषण में ज्यादा दिखता है। परिचर्चा के परिचालक की मुस्कान देखते ही बनती है। मेरे तालुका के एक महानुभाव परिचालक हैं जो हिन्दी भी अच्छी लिख लेते हैं। सप्ताह में पाँच दिन तकरीबन एक घंटे का इस "ठेल" का बखूब नुमाइश दिखवाते है। हास्य ,विनोद और व्यंग्य के नीचे छिपी हुई राजनीतिक हालात पर वेदना, प्रोग्राम के अंत में प्रगट हो ही जाती है।
"उसकी कमीज़ मेरी कमीज़ से सफ़ेद कैसे " , यही मुल मंत्र सा लगने लगा है रैलियों और भासणो का भी।
"उसकी कमीज़ मेरी कमीज़ से सफ़ेद कैसे " , यही मुल मंत्र सा लगने लगा है रैलियों और भासणो का भी।
लगभग एक दशक पहले ज्ञान बाबु चौक पर महेसर चा ने राजनीति के चार पहलुओं से अवगत कराया था। सुनते हुए जान चा भी तुलसी की चाय की चुस्कियो पर मुस्कुरा रहे थे। पहला "तेल " बताया था उन्होनों ,कहा इसके बिना तो हिन्दुस्तान ही बेरंग हो जाएगा। टिकट वितरण एक लंबी प्रक्रिया है हमारी राजनीतिक प्रणाली में और "तेल " उसका अटूट अंग बन गया है। पहला चरण चलता ही रहता है कि दुसरे तथा तीसरे चरण की शुरुवात हो जाती है ,"खेल " और "ठेल" का। "खेल तमाशा " सबसे मजेदार नज़ारा प्रस्तुत करता है हमारे राजधर्म के करमवीरो का , हाँला कि तथाकथित और स्व्यं घोषित बुद्धिजीवी वर्ग इसे प्रचार भी बुलाते है। "तेल" तो बदस्तूर जारी रहता ही है।
"ठेल " का विवरण तो आप और मै बखूबी समझते है। प्रयोग में "तेल " और "ठेल" के हम लोग भी कच्चे खिलाड़ी नहीं हैं। यकीन न हों तो एक बार आत्म -चिंतन कर देखिएगा। महेसर चा ने चौथा कोण "मेल " का दिया था , इसका क्रम न बताया था। चुनाव के परिपेक्क्ष में पता नहीं कौन किसका हाथ थाम ले या कौन किसके दामन से लिपट जाए समझ नहीं आता।
बगडू भाई इस "मेल-बेमेल" की बात पर महेसर चा और जान चा की तरफ़ इशारा कर बहुत हँसते। गोइटर के रोग के प्रकोप से के बारे में छूटता बंधन-2 में लिखा हैं। बागडू भाई का आशियाना कुछ दिनों के लिए हमारे घर में भी था। बड़की अम्मा बताती थी कि उनके पिता कभी बाबा के ताईद हुआ करते थे ,बगडू तीन चार सौतेले भाइयो से बड़े थे। उनके पिताजी बाद में बेतिया चले गए जहाँ के वह रहने वाले थे।बगडू भाई की माँ बचपन में गुज़र गयी थी। पिता के मरणोपरांत अपने ऊपर होते हुए हास्य और ज्यादती को न संभाल पाए , भाग के मोतीहारी चले आए। दादी, जिन्हें हम "ईया" कहते थे उनकी बदहवासी देख तमतमा गयी। फौरन उनके माँ और छोटे भाइयों को बुलवा भेजा और कह दिया की अब लल्लन यही रहेगा। हाँ , यहीं तो बगडू भाई का असली नाम था।
घर के कचहरी वाले भाग में खपरैल की छत वाले दो छोटे कमरों उनका नया बसेरा था। चाचा ने उनके सातवीं जमात के प्रमाणपत्र और उनकी शारीरिक विषेशता के आधार पर उनसे कुछ सरकारी महकमों में नौकरी का आवेदन दिलवाया। खज़ाने में बहाली हो गयी ,जिल्द मढ़ने का काम मिला। माँ बताती है कि अपने काम में मग्न वह दिन का खाना भी भूल जाते। पगार के दिन ,दादी के हाथ पर पाई-पाई रख देते। दादी जब ये कहती की अपने पास रखो या जमा कर दो तो भड़क उठते।दो तीन दिन तक मुँह विकृत करने का प्रयास जारी रखते ,फिर "ईया " जब पूछती की "लल्लन ,तेरी चाचियाँ खाने में ज्यादा मिर्च डाल रही है क्या ?," , तो हॅसने लगते। वैसे सुना की इन विशिस्ट व्यक्तियों की ज़िद ,क्रोध और लग्न भी विशिस्ट होती है। प्रेम भी ऐसा की बलुआ से ज्ञान बाबु चौक तक बढ़ती उम्र में भी साइकिल दौड़ा देते हैं सप्ताह में चार बार।
उनकी जिद का तो मुझे भी एहसास हैं। ज़र्दा आम सिर्फ चम्पारण और भागलपुर में ही होते हैं।भागलपुर में उसे जर्दालु कहते हैं। अदभुत स्वाद हैं ,जाफ़रान की महक आती हैं। आकार सफेदा ,मालदा या दशहरी से छोटा होता हैं पर स्वाद बेमिसाल। तीन पेड़ रघुनाथपुर के फुलवारी में थे। दादी की सख्त हिदायत थी की नीलामी में ये पेड़ नहीं जायेंगे , घर के बच्चें खायेंगे। रघुनाथपुर ,अरेराज के रास्ते में पड़ता हैं , बगडू भाई के घर से तकरीबन आठ किलोमीटर। दो तरफा फिर बलुआ से ज़िला स्कूल, हस्पताल ,टाउन हॉल ,मोतीझील ,मीना बाज़ार ,गांजा गद्दी ,पंचमंदिर पार करते हुए मध्य मई की गरमी में बगडू भाई हरेक दुसरे दिन को जर्दा आम लेकर दोपहर में हाज़िर रहते। बतीस किलोमीटर की साइकिल की सवारी। बड़े पुछने पर समझाते "मॉर्निंग " हो गया हैं कोर्ट। जर्दा आम तो कभी कभार नसीब भी हो जाता है ख़ाकसार को पर अब वो खुशबू नदारद सी महसूस होती है।
शादी में थोड़ी दिक्क़त आई जरूर पर उन्होंने साफ कर दिया था कि शादी अपनी तरह की लडकी से करूँगा। दादी ने बलुआ में रेल लाइन से सटे कुछ जमीन उनके नाम करवा दी। कुछ पैसे पिताजी ने दिए, कुछ चाचा ने बगडू भाई का आशियना तैयार हो गया। छोटा मकान था पर उतना सुंदर और साफ सुथरा घर मैंने सिर्फ बंगाल के बीरभूम के गावों या दक्षिण में ही देखा है।
परमात्मा अन्याय करता है ,दो जन्मजात शिशुओं को छीनना अन्याय नहीं हैं ,तो क्या हैं। खैर ,ईश्वर को दया आयी। दो बच्चो के पिता है ,दोनों वाद -विवाद में भाग भी लेते हैं। तेरह साल की गुड़िया सचमुच की गुड़िया है। मेरे दो मुस्टंडे है , कोई लड़की नहीं। गुड़ियां का कन्या दान हम दंपति द्वय ही करेंगे ऐसा जबां मैंने बगडू भाई और रेणु भाभी से हम दोनों मियाँ -बीबी ने ले लिया है। बगडू भाई की ज़िद और ज़बाँ कायम रहे। ..
घर के कचहरी वाले भाग में खपरैल की छत वाले दो छोटे कमरों उनका नया बसेरा था। चाचा ने उनके सातवीं जमात के प्रमाणपत्र और उनकी शारीरिक विषेशता के आधार पर उनसे कुछ सरकारी महकमों में नौकरी का आवेदन दिलवाया। खज़ाने में बहाली हो गयी ,जिल्द मढ़ने का काम मिला। माँ बताती है कि अपने काम में मग्न वह दिन का खाना भी भूल जाते। पगार के दिन ,दादी के हाथ पर पाई-पाई रख देते। दादी जब ये कहती की अपने पास रखो या जमा कर दो तो भड़क उठते।दो तीन दिन तक मुँह विकृत करने का प्रयास जारी रखते ,फिर "ईया " जब पूछती की "लल्लन ,तेरी चाचियाँ खाने में ज्यादा मिर्च डाल रही है क्या ?," , तो हॅसने लगते। वैसे सुना की इन विशिस्ट व्यक्तियों की ज़िद ,क्रोध और लग्न भी विशिस्ट होती है। प्रेम भी ऐसा की बलुआ से ज्ञान बाबु चौक तक बढ़ती उम्र में भी साइकिल दौड़ा देते हैं सप्ताह में चार बार।
उनकी जिद का तो मुझे भी एहसास हैं। ज़र्दा आम सिर्फ चम्पारण और भागलपुर में ही होते हैं।भागलपुर में उसे जर्दालु कहते हैं। अदभुत स्वाद हैं ,जाफ़रान की महक आती हैं। आकार सफेदा ,मालदा या दशहरी से छोटा होता हैं पर स्वाद बेमिसाल। तीन पेड़ रघुनाथपुर के फुलवारी में थे। दादी की सख्त हिदायत थी की नीलामी में ये पेड़ नहीं जायेंगे , घर के बच्चें खायेंगे। रघुनाथपुर ,अरेराज के रास्ते में पड़ता हैं , बगडू भाई के घर से तकरीबन आठ किलोमीटर। दो तरफा फिर बलुआ से ज़िला स्कूल, हस्पताल ,टाउन हॉल ,मोतीझील ,मीना बाज़ार ,गांजा गद्दी ,पंचमंदिर पार करते हुए मध्य मई की गरमी में बगडू भाई हरेक दुसरे दिन को जर्दा आम लेकर दोपहर में हाज़िर रहते। बतीस किलोमीटर की साइकिल की सवारी। बड़े पुछने पर समझाते "मॉर्निंग " हो गया हैं कोर्ट। जर्दा आम तो कभी कभार नसीब भी हो जाता है ख़ाकसार को पर अब वो खुशबू नदारद सी महसूस होती है।
शादी में थोड़ी दिक्क़त आई जरूर पर उन्होंने साफ कर दिया था कि शादी अपनी तरह की लडकी से करूँगा। दादी ने बलुआ में रेल लाइन से सटे कुछ जमीन उनके नाम करवा दी। कुछ पैसे पिताजी ने दिए, कुछ चाचा ने बगडू भाई का आशियना तैयार हो गया। छोटा मकान था पर उतना सुंदर और साफ सुथरा घर मैंने सिर्फ बंगाल के बीरभूम के गावों या दक्षिण में ही देखा है।
परमात्मा अन्याय करता है ,दो जन्मजात शिशुओं को छीनना अन्याय नहीं हैं ,तो क्या हैं। खैर ,ईश्वर को दया आयी। दो बच्चो के पिता है ,दोनों वाद -विवाद में भाग भी लेते हैं। तेरह साल की गुड़िया सचमुच की गुड़िया है। मेरे दो मुस्टंडे है , कोई लड़की नहीं। गुड़ियां का कन्या दान हम दंपति द्वय ही करेंगे ऐसा जबां मैंने बगडू भाई और रेणु भाभी से हम दोनों मियाँ -बीबी ने ले लिया है। बगडू भाई की ज़िद और ज़बाँ कायम रहे। ..
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