छुटता बंधन -४
पत्रकारिता और राजनीति की दूरियाँ तो पहले से ही कम रहीं है। पूरक ही कह सकते हैं एक दुसरे के। खबर कहाँ बनती हैं राजनीति के बगैर और राजनीति की पहुँच कहाँ पत्रकारिता के बगैर। सार्थक राजनीति में कई पत्रकारों ने बहुत मुल्यवान भुमिका निभाई हैं। क्षेत्रीय भाषा तथा हिंदी के पत्रकार इनमें ज्यादा संख्या में नज़र आते हैं। हाँलाकि ये भी स्पष्ट विदित हैं की कितनों ने दोनों के साथ सामंजस्य सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए ही किया हैं। वर्तमान राज्य सभा में अनेको ऐसे बाद वाले उदाहरण प्रतीत होते है। अजीबो ग़रीब रिश्ता हैं पत्रकारिता और राजनीति का, कभी ३६ का आँकड़ा कभी ६३ सा मेल। राहुल देव, रवीश कुमार , एस के सिंह , भूपेंद्र चौबे, अभय दुबे या दिबांग जैसे हिंदी पत्रकारिता के दिग्गज बक या लिख ले तो भी इन दोनों के रिश्ते के कुछ पहलु उज़ागर बच ही जाएंगे।
हाल फिलहाल में हिंदी टीवी से जुड़े परिचालक का एक राजनीतिक दल में शामिल होना काफी सुर्खियों में रहा है। नैतिकता के सवाल उठे है। हास्य -परिहास , व्यंग्य आदि-आदि के पात्र बन गए है ,महाशय। उनके साथ दसेक साल पहले वाले वाली एक राजनीतिक मान्यवर की बदतमीज़ी का भौड़ा फुटेज भी दिखाया गया।
पत्रकारिता के नैतिक मूल्यों पर बोलने की ना समझ हैं और ना ही औक़ात है,इस पेशे से अपना फासला खानदानी हैं। हाँ ,अंतराल "उनकी इस्तीफे और राजनीति में उतरने का" अट्पटा सा लगा। कुछ ठगा हुआ सा महशूस तो हम ख़ाक़सारो ने किया। उनकी साहस की दाद तो देनी पड़ेगी। इरादा तो अभी तक नेक ही दीखता है , विवादित हैं तो उनकी बड़बोली , तौर तरीका , कवरेज की अतृप्त इक्षा और अँग्रेज़ी की स्पेलिंग।
'फुफु दादी' हमेशा समझाती थी की तीन की इज्जत कभी ना छोड़ना " हकीम , उस्ताद और सहाफ़ी " का , हो सकें तो इन तीनों की सोहबत बनाए रखना। समझ बहुत देर से आइ उनकी ये सीख।
पंचमंदिर -ज्ञान बाबु चौक रोड के रास्ते में गुदड़ी बाज़ार से होकर मेन रोड को जोड़ती हुई एक सड़क है , बगल से ही एक रास्ता हेनरी बाज़ार को जाता है। आमने सामने दो अहातों के बीच की सड़क क्या थी मेरे लिए। बीसियों बार अपने घर से निकल कर उनके घर पहुँच जाता था। पिताजी तो उन्हें "ममानी" कहते थे पर मै उन्हें "फुफु दादी " ही बुलाता था, उनके भतीजों ने सीखा दिया था। निसंतान थी ,दो सौतेले पुत्र थे एक हाई कोर्ट में जज, दुसरे कुलपति थे एक विश्व- विद्यालय में बाद में राजनीति में घुसे और शिक्षा मंत्री भी रहें। दोनों बेटों का आना जाना काफी कम था। अफरात ज़मीन -जायदाद थी ,उन्होंने अपने दो भाईयों और एक बहन को अपने पास ही बुला लिया था। बहन -बहनोई को हाते में ही एक मकान दे रखा था, भाई दोनों उन्हीं के साथ रहते थे। बड़े वाले ने शादी न की थी और छोटे वाले के आठ बच्चे थे। आठों मुझसे बड़े थे और उन्हें फुफु बुलाते थे , मैंने और चचेरे भाई बहनो ने " फुफु दादी " ऐसे ही न पकड़ा था। हम भोजपुरियो को तो उनकी कम्बख्त, कम अक्कल वाली गालियाँ भी आशीर्वाद जैसी लगती ऊपर से उनका हमारे लिए दुलार।
इया उनके खाविंद को राखी बाँधती थी। इया बताती थी की बाबा और उनके मुँहबोले भाई में अजीब प्रतिस्पर्धा थी , पेशेवर जलन बताती थी। राखी , भाई-दूज और तीज कभी न भूलते थे "खान बहादुर।" दादी के अपने मैके से आये न आये इस भाई से सौगात ज़रूर आती थी , कुछ खुद भी उठाकर लाते थे "खान बहादुर' ऱश निभाने के लिए। मुझे नेपथ्य में अपने बाबा के होठो कि मुस्कान दिख जाती थी मानो ये बता रहे की वक़ालत चलती तुम्हारी ज्यादा हैं पर "राय बहादुर ' की शहर में इज्जत ज्यादा हैं।
फुफु अम्मा नब्बे को पार करने के बाद गुज़री। पिताजी के राय मशवरा के बिना कोई बड़ा फ़ैसला न लेती थी। माँ को खबर लेती रहती की कब उनका भांजा आयेगा। पिताजी जब भी घर आते तो घण्टे भर के भीतर अपनी ममानी के सामने हाजिर- नजीर हो जाते। मुझे कभी उन्होंने मेरे नाम से न बुलाया , "सुरेन्दर का बेटा " कहती थी। बचपन में उनके ऐसा कहने पर आँख तरेड़ देता था तो मुस्कुरा उठती , फिर थोड़े देर बाद बोलती "अरे , रूबी देख तो हरे चने का हलवा बचा है गर तो खिला सुरेन्दर के बेटे को , उसे बहुत पसंद है। "
शब ए बरात में तरह तरह के हलवे खुद अपनी हाथ से बनाकर खिलाती। अब भी कभी -कभार चने का हलवा मिल जाता है खाने को "फुफु दादी" का खुबशुरत मुखड़ा और उनकी इन्तहा कशिश वाली आँखों का क्या।
मेरे उर्दू न पढ़ पाने की एक वजह वो थी। खानदान कि एक परंपरा को अनजाने में तोडा मैंने। मलाल जीवन भर रहेगा , न न परंपरा तोड़ने का नही अपितु अपने उर्दु न सिख पाने का। इया ने घर पे अँग्रेजी और गणित के दो मास्टरों की सरपरस्ती लगवा दी थी। उर्दू के लिए मिस्कौट के पास मौलवी साहेब के मदरसे में ग्यारह बजे बिजई भाई छोड़ आते थे। घंटे की अलिफ ,बे ,पे,ते , एक और ते ,से ,जिम,चे ,हे याद करने के लिए , उदंडता में घिनौनी शरारत की तो अरशद मौलवी साहेब ने जबरदस्त मज़म्मत और मरम्मत कर डाली। बिजई भाई जब लेने आये तो मौलवी साहेब से भीड़ गए , "एंह , ज्यादा फारसी मत बकबकाइए , बउआ पे हाथ कैसे उठाए " और फिर भोजपुरी चालू हो गए। ऊपर पहले मंज़िल से "फुफु दादी" ने मुझे सिसकिया लेते हुए लौटते देखा, इशारा किया और दरबान के सामने बिजई भाई कि भी न चली। पूरी कहानी तो नमक मीढ़ हल्दी लगाकर बिजई भाई ने मेरा दोष छिपाते हुए एक ही साँस में बखा दिया। फुपु दादी ने बुर्क़ा ओढ़ा और पहूँच गयी इया के पास , 'न ,नहीं पढ़ेगा मेरा बच्चा ,किसकी मज़ाल हो जो मेरे बच्चे को हाथ लगा दे। किसने भेजा था इसे उस जल्लाद के पास। जाहिल जिससे गुल कि परवाह नहीं ,वो क्या बाग़ लगयेगा , अहमक़ , नामुराद ...." कुछ उर्दू अल्फाज़ तो मैंने वहीं सीख लिए। एक और बात जो मुझे याद है कि उन्होंने मेरा जिक्र मेरे नाम से ही किया।
चलिए भाई सहाफ़ी पुज्य, प्रशन पूछते रहिए , उत्तर मिले या गालियाँ , निर्भीक होकर , निस्पक्ष होकर बस थोड़ा मुस्कुराकर और हमारी भी थोड़ी सुनकर
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