Sunday, 9 March 2014

छुटता बंधन -5





                                   छुटता  बंधन -5

कार्य व्यस्तता के कारण कम लिख पाता हुँ , उससे  भी कम हिंदी में लिख पता हुँ।अँग्रेज़ी में भी थोड़ा  लिख लेता हुँ, मिशन स्कूल में पढ़ने के कारण से भाषा में  विचारणे की शक्ति बदलती है या नहीं , इस  बहस पर बेबाक बहस भी कर सकता हुँ।   मनोदोष कह लीजिए या फिर अनुचित स्वालोकन , जानता हुँ कि हिंदी में बुरा तो बिलकुल नहीं लिखता, हाँ भाषा की त्रुटिया और पद अशुद्धियां मानने में मुझे कोई संकोच नहीं । कुछ तो सॉफ्टवेयर  एप्लीकेशन  का कमाल हैं  और कुछ मेरे ज्ञान का। अँग्रेज़ी के जानकर मेरी लेखनी में "िनकहेरेन्स " को एक मुद्दा बताते है , "वैचारिक उतेजना' कह सकते है , अन्य्था  चलाऊ बोलते हैं।  पेशे से लेखक नहीं
हुँ न ही ये भ्रम है कि मुझमें वैसी  क़ाबलियत है। 


 हिंदी और क्षेत्रीय भाषा में लिखने वाले , उपेक्षा का रोना हर वक़्त रोते हैं।आग्रह उनसे ये कि  "आइना भी झाँक ले " पर सुनेगा  का कौन ? हिंदी का तथाकथित सिमटा सा अभिजात्य वर्ग के लिए संकुचित का प्रयोग कर के बदज़बानी नहीं कर सकता। हम जैसे शौकिया लिखने वाले के उनकी रचनाए  पढ़ लेना खुशकिस्मती ही समझिए , हाँ , भाई हमारे लिए हीं। आराध्यों को दोष देना हमारी संस्कृति की परम्परा के विपरीत है , खासकर जब मसला  हिंदी और क्षेत्रीय भाषा के लेखकों का हो। कुछ दोष तो परस्तिथिया भी उजागर कर देती हैं।  संचार तकनीक का इस्तेमाल करते हुए मैंने गिने चुने प्रतिष्ठित हिंदी लेखको को हीं देखा हैं। अगर मेरी ये धारणा गलत निकली तो सच मानिये कुछ शुकून सा मिलेगा। स्कूली साहित्य में कही पढ़ा था कि लेखक समाज और पाठकों की  मानसिकता से ज्यादा ऊपर जा ही नहीं सकता। न जाने क्यूं लगता है कि यह  मेरी  सच या मिथक ज्यादा  हैं।  परंतु जब अँग्रेजी के लेखकों को देखता हुँ तब पुनर्विश्वास हो जाता हैं की "जी बी सॉ " ने अतिश्योक्ति नहीं कि थी। 
फासला मंज़िल का बढे तो उतना दर्द नहीं होता जितना काफ़िले में परस्पर फासलों से होता हैं। 

हिंदी पत्रकार  गण और परिचालक गण काफी मात्रा मे सोशल मीडिया का  प्रयोग करते हैं। इस दौरान कुछ ने हिंदी व्यव्हार की कोशिश भी की हैं। ऐसे ही द्वय की प्रेरणा लेकर हिंदी में कुछेक दिनों से लिखना चालु किया था। अब इस  समुह की साहित्य में स्तिथि बहुत ही महत्वपूर्ण पर जटिल सी लगती है ,हम ख़ाक़सारो को। ये तो मानना पड़ेगा कि इनका संवाद दर्शको से काफी हैं।  कुछ माध्यम की मज़बूरी और  कुछ इनकी अपनी अभिलाषा , पाठक या दर्शक के साथ इनका संपर्क जारी है बदस्तूर।  पर बात इतनी सरल होती तो कोई मुद्दा ही न था। भाषा की दुर्दशा पर ये भी चिल्लाते हैं।  कुछ मज़बूरियाँ इनके साथ भी  है।  राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी पत्रिकाएं की लोकप्रियता तो विदित है , राष्ट्रीय हिंदी अखबारो ने क्षेत्रीयता का सहारा पकड़ रखा हैं। एक दो राष्ट्रीय हिंदी टीवी चैनलो को छोड़ ,बाकी के निस्पक्षता  और  वस्तु -विशेष पर  विश्वस्तता  किसी एक  चौराहे पर दिन भर खड़े होने से  पता चल जाता है, ऊपर से क्षेत्रीय टीवी चैनलो का विस्तार।  
 ये हमारे भावनावो के नुमाईन्दे  सिर्फ खबरों दिखाकर या हमारी राजनीति की हिंसक असहमति और वैचारिक  खोखलापन दिखाकर बच निकलते है। इनका  योगदान भाषा  के प्रति क्या हों , जो इनकी भी चलती रहे और भाषा का प्रशार भी निरंतर हों। प्रार्थना , महानुभवों  कि एक और माध्यम बनिए हिंदी के साहित्यकारों और पाठको के बीच। पहुँच तो कोई समस्या ही नहीं हैं , हम  ख़ाक़सारो   को इसमें अवसर दीखता  है। भाषा प्रचार के एक स्तम्भ है आप अब माध्यम बन जाइये।  पाठक गण को अपनी अभिव्यक्ति का सुयोग दीजिये, बाछियें , छांटिए  कुछेक को प्रेरित कीजिये , आलोचना, विश्लेषण,प्रोत्साहन जैसे भी। एक को चुनकर कुछ दिनों तक उसे भाषा और अभिव्यक्ति  की बारीकियों की तरफ प्रेरित कीजिये। ये पद्धति  निरंतर चले , कुछ समय  तो गुज़ारिए अपनी  भाषा के लिए। 
 ये फ़क़त एक मशवरा हैं , आपकी   बुद्धिमत्ता और भाषा कि उन्नति की ईक्षा  मुझ जैसों से तो  लाख गुनी ज्यादा  हैं। तात्पर्य ये कि भाषा प्रयोग, विकास तथा माध्य की और अग्रसर होइए। समाज में विचारो कि इस देश में कमी कब थी , सटीक  व्यक्त करने का जरिया कौन होगा ?

पाठकों और दर्शकों के  रवैये पर आप से बेहतर कौन लिखेगा।  व्यंगय-हास्य ज्यादा न लिखियेगा और हलके में लिखिएगा । चुनावी माहौल है , बहुतों कि नज़र रहती हैं।  "पक्षपाती , पैड मीडिया , LIO,                          :-),D,P,LIQ"आदि -आदि  कि उपाधि तो हम श्रोता गण ,दर्शक गण दे न दे, गण जरूर देते हैं  ।  राजनीति के   भक्तो के समझ कि दाद देता हूँ।  आलु को बैगन से , फिर बैगन को टिंडे से ,और न जाने कहाँ तक रायता फैलाते है। अब तो केन्या कि "उगाळी " या  मोर्रोको के"बिस्तीयाँ सरीखे   पकवान भी सूँघा देते हैं ट्विटर पर पत्रकारों को। 


तीसेक वर्षो  से समाचार देखता और पढता हुँ , अँग्रेज़ी  में ही पढ़ा और देखा। जीवन के उत्तरार्द्ध में पहुँचा तो लगा की पुरानी पहचान न टूटनी चाहिए चाहे आप बहुत सारी नयी बना लो तो भी। मेरे सबसे बड़े वैचारिक आलोचक , मेरे पिता और चचेरे भाई मेरा यह नयी मोहब्बत देख मंद -मंद मुस्कुराते है। किशोर बालक द्वय  चिढ़ते है तो समय और टीवी का बॅटवारा कर लिया हुँ , हाँ पर इन्हें वो गलती न करने दूँगा ,जो मैंने की थी। सुखद आश्चार्य की एक उत्पाती ,मेरी तरह एक परिचालक को पसंद कर रहा हैं।  शायद एक ही तालुका के होने से उसे मेरे और पिताजी कि भाषा शैली का पुट उस परिचालक में भी दीखता हैं। "गीता" और "एथिकल मैनेजमेंट" का "माध्यम सर्वोप्परी - मंज़िल स्वतः " वाला सिद्धांत जान बूझ कर भूल जाते है हम तीन पीढ़ी। "सेंटीमेंटल फ़ूल " तो हमें  ही कहते हैं , ये बड़े बड़े राजनीतिज्ञ और प्रशाशनिक चिंतक। 

अंत में "बगडू  भाई" जिनका जिक्र मैंने छूटता बंधन -३  में किया था सिर्फ एक बार ही मोतिहारी से बेतिया गए। सौतेली माँ के इंतेकाल पर।  बाप दादाओं का जो कुछ था , सौतेले भाइयो पर छोड़ दिया।  कोई निशानी भी न माँगी अपनी विरासत को याद करने के लिए। मेरे चचेरे भाई उन्हें अपनी गाड़ी में लें गए थे।  लौटते वक़्त पुछा कि भाई ,एक कुर्सी या दराज वाली मेज ही माँग लेते ,विरासत की निशानी मानकर तो चिर-परिचित मुद्रा  में भकुटी तान ली। कुर्ते से डायरी निकाली और कलम भी और लिखा 
" रामयण लिखले मन का टूटल गोसाई 
  बगडू के है अभी जिन्दा दो हट्टे भाई "
इया के जाने के बाद  उनकी "कैथी लिप्पी" वाली डायरी हमने बगडू भाई के पुजा वाले कमरे में रखा देखा है। चाचा के गुजरने पर  उनकी  पुरानी रेलवे टाइम टेबल ,जिसमें चाचा करीबन सौ कोर्रेक्शंस कर चुके थे वो भी बगडू भाई ने हथिया ली हैं। 

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