Wednesday, 12 March 2014

छुटता बंधन -6




                                         

                        छुटता बंधन -6


एक दो दिन पहले सोशल मीडिया पर एक राजनीतिक दल के भक्तों को पाप -पुण्य का प्रयोग बहुतायत में करते  देखा , समझ ना पाया। चैनेल -सर्फिंग कि तो मसला कुछ पल्ले पड़ा। यकीन मानिये ,मुस्कुराहट  भी ना आई ,कटाक्षों पर। एक टीवी चैनल  तो  बजाप्ता फुटेज दिखा चटखारें ले रहा था , वैसे उस चैनल ने सारी नैतिकता की चादर ओढ़ ली थी। बाकी पत्रकारों  को एक इंच भी न दिया था ढकने के लिए । राजनीति में गणन की कला तो  मजबूरी हैं लगता हैं की पत्रकारिता में इस कला ने पैठ कर लिया हैं।

       तिजारत ही क़ाबिल -ए -ेअते माद की तरक़ीब , हैं  उनका फ़साना :
       इल्म -उल -अदद  कब बनी इंसान की तसदीक़ , खाकसार भी जाना।
( तिजारत - व्यापार ,ेअते  माद - विस्वास ,इल्म-उल-अदद -- गणन की कला ;तसदीक़ --इमान )

सीधे पुण्य के बारे में ज्यादा कुछ लिखना खुद से बेमानी और बेईमानी होगी ,इसीलिए पाप के बाद वाले पुण्य के बारे में ही लिखुँगा। 

अजीब-गरीब सा रिश्ता तुने मुझसे बना लिया। सर पर मातृ वृत तु उसी दिन बैठ गयी ,जिस दिन ब्रोदर जोस ने स्कूल में विवरण में तेरा नाम जोड़ दिया। मैंने प्रतिवाद किया तो वो थोड़ा अचंभित हुए पर तेरी महिमा के आगे मेरी ना चली , ब्रोदर जोस तो फिरंगी थे ,उन्हें हमारे रिश्ते का क्या इल्म। आज समझ में आता है कि सदन ,बिजई भाई ,उगम भाई और नारायण ठाकुर सरीखे कम पढ़े या अनपढ़  लोग क्यूँ तुझसे घबराते थे। व्यवहारिक ज्ञान में निपुण ये मेरे सरल प्रिय -जन बखूब तेरे पापों को भाँप गए थे। तुझे सुनते ही बड़बड़ाने लगते "ढेर काबिलियत " बड़बड़ाने लगते। उनकी  अस्मिता खतरे में दिखती होगी उन्हें ,तेरे प्रचार प्रशार से। दुनियादारी में निश्चय ये ज्यादा ज्ञानी हैं। 

प्रवाशी हुँ , अगर मेरे क्षेत्र का कोई कम पढ़ा  दिखता हैं तो आत्म -भाव से तेरे बहन या अपनी  मातृ -भाषा  का प्रयोग करने की कोशिश में ज्यादातर नाकामी मिलती।  शायद , उन्हें  अपना  बारंबार  आत्मीयिता के नाम पर ठगना याद आता होगा। फायदा उठाने वाला शोषक से कोई अपनी  मज़बूरी बयाँ करता है क्या ? तुझे क्या फर्क पड़ता हैं , तेरे कद्रदानो में तो इजाफा हो रहा है। 

निष्ठुर है तु।  पहले  मेरे बाबा -दादी  के प्रयोग वाली "कैथी" लिपि को खा लिया।  अब मेरे मातृ -भाषा  के  पीछे लगी है। क्या  चरित्र है तेरा , तूने अपनी सबसे नज़दीकी बहिन  को भी न बक्शा है।  इल्म कि भाषा को बेआबरू तु ही कर रही है। साम्यवाद के जोश में रूस में सब उपनामों के पीछे "ओव " "इव " या "इच " लगाना मज़बूरी थी ,वैसा ही तेरा रूप मुझे दिख रहा है। बिहार -यु पी  के कुछ क्षेत्रीय भाषाओं और लिपियों की भक्षा तूने कर ली है ,अपने आराधय जननी की दुर्दशा की जिम्मेदार  तु  ही दिखती हैं मुझे। 

हम  जैसे खाकसार तो सोचते है  या तो अपनी मातृ -भाषा  में  या  फिर  एक विदेशी में  ,तुझमे तो  कदापि नहीं।मेरे जैसे  माणुस  जज़बात या उत्तेजना में या अपनी मातृ -भाषा अन्यथा उसी विदेशी भाषा का प्रयोग करते है। तूने  ऐसा शमां बांधा की  मूल तो पीछे छुट गया।  हाँ , तुझे निजाद ना मिली। अब नयी पीढ़ी उस विदेशी मेम को तरजीह दे रही हैं। 

नारायण ठाकुर घर के हज्जाम थे।  हाते  में गैराज के पीछे सपरिवार रहते थे।  लकड़ी का एक बक्शे में छुरा , टिकिया ,डेटॉल  वाला  पानी , ऐनक  रखकर अपना व्यवसाय चलाते थे। पंचमंदिर से लेकर ज्ञान बाबू चौक तक , हेनरी  बाज़ार और गुदड़ी  बाज़ार उनका इलाका था। सब खबर रहती थी , कहाँ किसने ज़मीन के लिया कितना बयाना दिया हैं ,किसके रिश्ते कि बात कहाँ चल रही है, किसके घर में नमक  कम पड़ता है अदि-अदि। सुबह चाचा कि हज़ज़ामत बना कर निकल जाते। सालाना पैसे , धान , सरसो और जरूरत अनुसार उनका बनता था और वह बखूब उसळते भी थे। मोहल्ले के किशोरों को खैनी की आदत लगवाते और फिर आभाव का पिटारा खोल उन सबो से सुबह -सुबह  एकाध रुप्पिया वसूलते। पहली दाढ़ी बनाने के समय माँ -पिताजी दोनों से अलग नया छुरा औऱ गमछा का पैसा' वसुल लिए रहे , रश्म के पैसे अलग से। मेरी पहली पगार से साफा ,कुरता ,पयजमानुमा पैंट , चमड़े'कि चप्पल , गमछा ,गंजी इत्यादि  उन्होनो और बिजई भाई ने लिया था। बाद में पता चला कि पंचमंदिर के पास बैठे  भिखारियों को उन दोनों ने दिन में खाना खिलया था 
 और पूजा-अर्चना भी कि थी

नारायण ठाकुर की हरेक  शाम ताड़ वृक्ष के उत्पाद  के सानिघ्य बीतती।  बड़ा हुआ तो बघारते थे कि चौदह की उम्र से फ़लक़ -नुमा दरख़्त का रिसाव  का सेवन हरेक दिन किया है पर कभी अपने पैसो से नहीं। होली के दिन विलायती ही छूते थे।होली के दिन  खाना  खाने के बाद हम भाई -बहन  गोल वाली चबूतरे पर बैठ जाते ,नारायण ठाकुर भी हाजिर हो जाते और हमें अपने अंदाज़ में अँग्रेज़ी में बकबकाते।  "सौदागर " में दिलीप कुमार एक  जगह वैसे ही बोलते दिखाय गय है। फिर  उठकर  घर  के चौके  में  बाकियों  के साथ भोजन को जाते।

खैर , तू जैसी भी है छल -रुपी , मेर पूज्य ही है।  तेरे पाप तो मैंने  गिना दिए , तेरे पुण्य गिनने वाले मुझसे हुनरदा  और क़ाबिल है।  संस्कृति और माँ -बाप कि दी सीख से  तेरा क्या किसी भाषा का निरादर नहीं कर सकता।



इस  ब्लॉग  का  सूत्र  मेरा  खुद का न है। एक महानुभाव के लेखनी  ने मुझे और मेरे विचारो को  झकझोरा था। " हिंदी  कि आधुनिकता" 









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